
धर्म और अंधविश्वास
सृष्टि के आदिकाल से ही भारत विश्व पटल पर एक 'धर्मप्राण देश' के रूप में प्रतिष्ठित रहा है। कई सदियों तक विदेशी आक्रांताओं के हमलों और अत्याचारों को लगातार सहन करते हुए भी यह देश अपनी आध्यात्मिक एवं धार्मिक मान्यताओं को जीवित रखने में सफल रहा। यही कारण है कि आज भी वैश्विक बिरादरी में भारत का एक विशिष्ट और महत्वपूर्ण स्थान है। संसार भर से लोग अपनी जिज्ञासा शांत करने और यह जानने भारत आते हैं कि इतने लंबे समय तक विचलित किए जाने के बावजूद यह देश आध्यात्मिक दृष्टि से इतना उन्नत कैसे बना रहा।
मूल वैचारिक प्रश्न
क्या धर्म का वास्तविक अर्थ ढोंग, पाखंड और अंधविश्वास है? अथवा धर्म वह सार्वभौम सत्य है जो मानव मात्र के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है?
1. धर्म का मूल स्वरूप बनाम गंगा नदी का रूपक
प्रकृति का नियम है कि हिमालय से निकलने वाली पवित्र गंगा नदी जितने प्राणियों का कल्याण करते हुए आगे बढ़ती है, आगे जाकर मानवीय कृत्य और समय के प्रभाव से वह उतनी ही गंदी होती चली जाती है। जहाँ उसका उद्गम जल इतना पवित्र होता है कि वर्षों तक घरों में सुरक्षित रखने पर भी सड़ता नहीं, वहीं जब वह नदी बंगाल की खाड़ी की ओर बढ़ती है तो उसका जल सड़ने लगता है और उसमें कीड़े पड़ने लगते हैं।
ठीक यही स्थिति हमारे देश में धर्म की भी हुई है। विशुद्ध, सार्वभौम वैदिक धर्म- जिसमें परमपिता परमात्मा द्वारा समस्त प्राणिमात्र के कल्याण के अतिरिक्त कोई निजी स्वार्थ या हेतु नहीं था- समय के साथ विकृत होता गया। स्वार्थी, अधकचरे, धर्म के मर्म को ठीक से न समझने वाले धूर्तों, मठाधीशों, ढोंगी बाबाओं और उनके अनपढ़ चेलों ने अंधविश्वास का ऐसा जाल बिछाया कि भारत का भोला-भाला जनमानस उनका गुलाम बनकर रह गया।
2. महापुरुषों का प्रयास एवं महर्षि दयानन्द का योगदान
महाभारत युद्ध के पश्चात जब भारत का सामाजिक एवं धार्मिक पतन होना शुरू हुआ, तब इस त्रासदी और अंधविश्वास के जाल को महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने पहचाना। उन्होंने आजीवन यह भरपूर प्रयास किया कि भारत अपने उसी प्राचीन वैदिक गौरव और सत्य ज्ञान को पुनः प्राप्त कर सके। परंतु अनहोनी को वे भी टाल न सके और अपने प्राणों का बलिदान देकर इस संसार से विदा हो गए।
आज केवल ग्रामीण परिवेश ही नहीं, बल्कि पढ़े-लिखे शहरी परिवेश और बुद्धिजीवी वर्ग में भी अंधविश्वास गहराई तक पैठ बना चुका है। घर से बाहर निकलते समय छींक आना, बिल्ली द्वारा रास्ता काट जाना, या खाली बाल्टी का सामने आ जाना जैसी अनर्गल और भ्रामक धारणाओं ने शिक्षित समाज को भी मानसिक रूप से जकड़ रखा है।
3. व्यावसायिक धर्म और दिशाशूल का आडम्बर
आज सुशिक्षित समाज में भी यह प्रथा व्यापक रूप से दिखाई देती है कि किसी भी कार्य को करने के लिए दिशाशूल, शुभ मुहूर्त, तिथि, वार आदि के बारे में पंडितों से पूछकर ही निर्णय लिया जाता है। आश्चर्य की बात यह है कि कितनी ही विद्वता या वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद लोग इस अंधविश्वासी परंपरा से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं।
कई स्थानों पर धर्म और अध्यात्म को जीविका का धनोपार्जन केंद्र बना लिया गया है। ऐसे पंडित और धर्माचार्य लोगों को काल-स्रास और ग्रहों के विपरीत प्रभाव का भय दिखाते हैं। हानि, दुख और मृत्यु का डर दिखाकर निवारण के नाम पर मोटी दक्षिणा प्राप्त करना ही उनका एकमात्र उद्देश्य बन गया है। धर्म के इन कथित ठेकेदारों के मन में सत्यता या सेवा भाव नहीं, बल्कि केवल धन कमाना मुख्य ध्येय रह गया है।
4. जन्मपत्री और ३२ गुणों का मिलानः एक भ्रामक प्रथा
विवाह योग्य लड़के-लड़कियों की जन्मपत्री का मिलान करना भी इसी व्यावसायिक अंधविश्वास का एक बड़ा उदाहरण बन चुका है। हमें व्यावहारिक और तार्किक रूप से विचार करने की आवश्यकता है:
- क्या ३२ गुणों के मिलान से सुख की गारंटी है? क्या ३२ गुणों के मिलान के बाद वर और कन्या में सदैव मैत्री भाव और प्रेम बना रहता है?
- क्या बिना कुंडली मिलान वाले दुखी हैं? क्या वे दंपत्ति जिनकी जन्मपत्री कभी नहीं मिलाई गई, वे अपने गृहस्थ जीवन में दुखी हैं?
5. जागृति और संकल्पः अंधविश्वास से मुक्ति का मार्ग
यदि आप वास्तव में जीवन में सुखी रहना चाहते हैं, तो इन अंधविश्वासी जड़ों से सजगता के साथ ऊपर उठना होगा। इसके लिए यथायोग्य व्यवहार, सही समझ और उचित पुरुषार्थ (कड़ा परिश्रम) का दृढ़ संकल्प करना होगा। अंधविश्वासों का सहारा लेकर हम स्वयं भी दुखी होते हैं और अन्य लोगों के दुख का कारण भी बनते हैं।
6. निष्कर्ष (Conclusion)
यदि आप कभी भी किसी ऐसी परिस्थिति या मानसिक भ्रम में स्वयं को असहज महसूस कर रहे हैं, तो किसी ढोंगी के पास जाने के बजाय सत्य, ज्ञान और स्वाध्याय का मार्ग अपनाएं। दार्शनिकों ने सत्य ही कहा है-
अंधविश्वास के अंधकार को त्यागकर विवेक और कर्म के प्रकाश की ओर बढ़ना ही सच्चे धर्म का अनुसरण करना है।